Saturday, 12 September, 2026
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दो आदिवासी छात्रों की मौत... कार्रवाई का पैमाना अलग क्यों? मर्दापोटी मामले में अधीक्षक निलंबित... सारंडी में अब तक कार्रवाई स्पष्ट नहीं #KankerNews #Antagarh #SarandiAshram #MardapotiAshram #TribalStudent #AdivasiNews #AshramSchool #SuspiciousDeath#
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एक मौत पर निलंबन, दूसरी मौत पर खामोशी? सारंडी आश्रम ने खड़े किए सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल

कब्र खुदवाकर कराया गया था पोस्टमार्टम, मलेरिया की दवा और अधीक्षक की मौजूदगी पर सवाल

कांकेर:- न्याय सबके लिए समान है लोकतंत्र में यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि व्यवस्था पर जनता के भरोसे की बुनियाद है। लेकिन कांकेर जिले के दो आदिवासी आश्रमों में घटित घटनाक्रम ने अब इसी भरोसे पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। एक तरफ मर्दापोटी बालक आश्रम में आदिवासी छात्र की मलेरिया से मौत के बाद आश्रम अधीक्षक को निलंबित कर दिया गया। दूसरी तरफ सारंडी बालक आश्रम में नाबालिग आदिवासी छात्र की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत, कब्र से शव निकलवाकर पोस्टमार्टम और कई गंभीर सवालों के बावजूद संबंधित आश्रम अधीक्षक पर अब तक कार्रवाई स्पष्ट नहीं है। सवाल सीधा है-जब दोनों मामले आदिवासी बच्चों की मौत से जुड़े हैं, तो कार्रवाई का पैमाना अलग-अलग क्यों दिखाई दे रहा है….?

16 जुलाई की मौत, 19 जुलाई को खुली कब्र

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अंतागढ़ ब्लॉक के सारंडी बालक आश्रम में 16 जुलाई को एक नाबालिग आदिवासी छात्र की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। घटना के बाद छात्र की मौत को मलेरिया से जोड़कर देखे जाने की बात सामने आई। आरोप है कि बिना शव परीक्षण कराए अंतिम संस्कार कर दिया गया।लेकिन मामला तब नया मोड़ लेता है, जब मीडिया के सवालों के बाद मृत छात्र के पिता ने अपने बेटे की मौत का सच जानने के लिए ताड़ोकी में शिकायत दर्ज कराई और शव परीक्षण की मांग की। इसके बाद 19 जुलाई को कब्र से शव बाहर निकाला गया और पोस्टमार्टम कराया गया। अब सवाल है-पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या आया?….मौत की वास्तविक वजह क्या थी?…और सबसे महत्वपूर्ण-यदि रिपोर्ट में किसी प्रकार की लापरवाही या अन्य तथ्य सामने आए, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई कहां है?

मलेरिया पॉजिटिव था तो इलाज के बाद मौत कैसे?

मामले से जुड़े लोगों के अनुसार आश्रम अधीक्षक, रसोइया, स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों और छात्र के सहपाठियों की ओर से यह बात सामने आई थी कि छात्र की मलेरिया जांच पॉजिटिव आने के बाद उसे मलेरिया की दवा दी गई थी। अगर यह जानकारी सही है, तो फिर सवाल कई हैं….छात्र की नियमित निगरानी हुई थी या नहीं?….स्वास्थ्य बिगड़ने पर तत्काल चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं मिली?….क्या आश्रम में बीमार बच्चे के लिए पर्याप्त मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन हुआ?….और यदि मलेरिया की दवा दी गई थी, तो छात्र की मौत की परिस्थितियों की विस्तृत जांच क्यों जरूरी नहीं समझी गई?

घटना की रात अधीक्षक कहां थे?

मामले में आश्रम अधीक्षक की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं….बताया गया कि घटना की रात आश्रम अधीक्षक बच्चों के बीच मौजूद नहीं थे और अपने घर पर रहने की बात सामने आई थी।…यदि जांच में यह तथ्य सही साबित होता है, तो सवाल बेहद गंभीर है-नाबालिग बच्चों की सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी उस रात किसके भरोसे थी?…..क्या आश्रम में रात्रिकालीन निगरानी की कोई व्यवस्था थी?….क्या विभाग ने इस पहलू की जांच की?…और यदि लापरवाही सामने आई, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

दस दिन बाद मर्दापोटी में दूसरी मौत

सारंडी की घटना के लगभग दस दिन बाद जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर मर्दापोटी बालक आश्रम के एक अन्य आदिवासी छात्र की जिला मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान मौत हो गई। इस मामले में मलेरिया से मौत की पुष्टि होने की बात सामने आई इसके बाद 19 अगस्त को मर्दापोटी आश्रम के अधीक्षक यशवंत गुना को लापरवाही के आरोप में निलंबित कर दिया गया और उनका मुख्यालय कोयलीबेड़ा निर्धारित किया गया,यहीं से दोनों घटनाओं के बीच कार्रवाई के अंतर को लेकर सवाल उठने लगे।

जांच समिति बनी, लेकिन जांच कहां है?

मामले से जुड़े सूत्रों का दावा है कि मर्दापोटी प्रकरण में जांच समिति गठित की गई थी, लेकिन जांच पूरी होने से पहले ही आश्रम अधीक्षक के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई कर दी गई। वहीं, सारंडी मामले में पोस्टमार्टम तक की प्रक्रिया होने और आश्रम प्रबंधन की भूमिका को लेकर सवाल उठने के बावजूद कार्रवाई का स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया है। अगर मर्दापोटी में बिना अंतिम जांच प्रतिवेदन के निलंबन संभव है, तो सारंडी मामले में अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?…क्या विभाग दोनों मामलों को अलग-अलग नजरिए से देख रहा है?….या दोनों मामलों में परिस्थितियां अलग हैं?…इसका जवाब विभागीय जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकता है।

डेढ़ लाख रुपये के कथित लेन-देन का आरोप

सारंडी मामले को लेकर अब सबसे गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि आश्रम अधीक्षक को कार्रवाई से बचाने के लिए शिक्षा विभाग से जुड़े एक आदिवासी अधिकारी की कथित भूमिका रही और मामले को दबाने के लिए करीब डेढ़ लाख रुपये के कथित लेन-देन की चर्चा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है,यही वजह है कि अब सबसे बड़ा सवाल आरोप की सत्यता से पहले जांच की निष्पक्षता का है। यदि आरोप गलत हैं तो जांच के जरिए उन्हें खारिज किया जाना चाहिए। लेकिन बिना जांच के आरोपों का सच सामने नहीं आ सकता। सूत्रों का यह भी दावा है कि संबंधित अधिकारी पर पूर्व में भी लेन-देन से जुड़े आरोपों की चर्चा रही है। युक्तियुक्तकरण के बाद शासन के आदेश के अनुसार कार्यभार ग्रहण नहीं करने वाले शिक्षकों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई के दौरान कथित रूप से पैसों की मांग किए जाने की बातें सामने आने का दावा किया गया था । यह भी कहा जा रहा है कि एक शिक्षक ने कथित बातचीत रिकॉर्ड कर ली थी। इन आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यदि ऐसी कोई रिकॉर्डिंग या शिकायत मौजूद है, तो उसकी निष्पक्ष जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है।

बाल संरक्षण आयोग की भूमिका पर भी सवाल

मर्दापोटी मामले में बाल संरक्षण आयोग के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई आगे बढ़ने की बात सामने आई है। अब सवाल उठ रहा है कि सारंडी मामले में राज्य बाल संरक्षण आयोग ने क्या संज्ञान लिया? यदि संज्ञान लिया गया है तो अब तक क्या कार्रवाई हुई? यदि नहीं लिया गया, तो नाबालिग आदिवासी छात्र की संदिग्ध मौत के मामले में संज्ञान क्यों नहीं लिया गया?

सारंडी आश्रम की घटना ने कई सवालों को जन्म दिया है-मौत की वास्तविक वजह क्या थी?…पोस्टमार्टम रिपोर्ट का निष्कर्ष क्या है?….मलेरिया जांच और इलाज का पूरा रिकॉर्ड क्या कहता है?….घटना की रात आश्रम की निगरानी व्यवस्था कैसी थी?….आश्रम अधीक्षक पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?….मर्दापोटी में निलंबन और सारंडी में खामोशी क्यों? क्या आदिवासी बच्चों की मौत के मामलों में भी जवाबदेही का पैमाना अलग-अलग है?

अधिकारी का पक्ष नहीं मिल सका

मामले में कार्रवाई और जांच की वर्तमान स्थिति जानने के लिए संयुक्त संचालक, जगदलपुर से मोबाइल के माध्यम से संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका। इसलिए उनका पक्ष इस रिपोर्ट में शामिल नहीं किया जा सका। 

कब्र बंद हुई, सवाल नहीं

एक पिता ने अपने बेटे की मौत का सच जानने के लिए कब्र खुदवाई,शव का पोस्टमार्टम कराया। अब उसकी उम्मीद सिर्फ इतनी है कि उसके बेटे की मौत का सच सामने आए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय होक्योंकि कब्र में सोया वह मासूम अब सवाल नहीं पूछ सकता। लेकिन उसका पिता पूछ सकता है….मेरे बेटे की मौत कैसे हुई?….किसकी जिम्मेदारी थी?..और न्याय कब मिलेगा?

अब देखना यह है कि इस मासूम की मौत का सच भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा या निष्पक्ष जांच की रोशनी में सामने आएगा। क्योंकि न्याय तभी समान माना जाएगा, जब सवाल पूछने वाले पिता को भी वही जवाब मिले, जिसकी उम्मीद व्यवस्था से की जाती है।

 

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About Prakash Thakur

प्रकाश ठाकुर, पेज 16 न्यूज़ के मुख्य संपादक हैं। एवं वर्षों से निष्पक्ष, सत्य और जनहितकारी पत्रकारिता के लिए समर्पित एक अनुभवी व जिम्मेदार पत्रकार के रूप में कार्यरत हूँ।

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