कांकेर:-प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ व संतुलित बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत शालाओं में छात्र संख्या के अनुपात में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 28 अप्रैल 2025 को युक्तियुक्तकरण नीति लागू करने के आदेश जारी किए गए थे। इसके तहत जिला कलेक्टरों और जिला शिक्षा अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे।
कांकेर जिले में भी इस नीति के अंतर्गत शिक्षकविहीन एवं एकल शिक्षक शालाओं को चिन्हित कर प्रधान अध्यापकों, शिक्षकों, व्याख्याताओं एवं सहायक शिक्षकों का स्थानांतरण किया गया। कई शिक्षकों को विकासखंड स्तर पर तो कुछ को जिले से बाहर अन्य जिलों में भी पदस्थापित किया गया। हालांकि युक्तियुक्तकरण के दायरे में आने वाले कुछ शिक्षकों ने आदेशों की अनदेखी करते हुए आज तक पदभार ग्रहण नहीं किया।
आदेशों की अवहेलना को गंभीर मानते हुए राज्य शासन एवं स्कूल शिक्षा विभाग ने सख्त कदम उठाते हुए निलंबन की कार्रवाई शुरू कर दी है। हाई स्कूल एवं हायर सेकेंडरी शिक्षकों पर डीपीआई रायपुर, पूर्व माध्यमिक शालाओं पर संयुक्त संचालक जगदलपुर तथा प्राथमिक शालाओं के शिक्षकों पर जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा कार्रवाई की जा रही है। डीपीआई रायपुर और संयुक्त संचालक जगदलपुर ने निलंबन आदेश बाकायदा सार्वजनिक भी कर दिए हैं।
इसके विपरीत कांकेर जिला शिक्षा विभाग ने निलंबन की पूरी प्रक्रिया को गोपनीय बनाए रखा है। विभाग ने केवल संख्यात्मक जानकारी साझा करते हुए बताया कि जिले में कुल 35 शिक्षकों को निलंबित किया गया है। इनमें भानुप्रतापपुर से 5, दुर्गुकोंदल से 3, कांकेर से 5, नरहरपुर से 5 तथा चारामा विकासखंड से सर्वाधिक 15 शिक्षक शामिल हैं। निलंबित शिक्षकों की नामवार सूची अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है।
सूची सार्वजनिक न होने से जिले में चर्चाओं का बाजार गर्म है। सोशल मीडिया पर लगातार सवाल उठ रहे हैं कि जब डीपीआई रायपुर और संयुक्त संचालक जगदलपुर द्वारा निलंबन सूची सार्वजनिक की जा सकती है, तो कांकेर शिक्षा विभाग ऐसा क्यों नहीं कर रहा। जानकारों का कहना है कि निलंबन जैसे प्रशासनिक आदेश आमतौर पर सार्वजनिक किए जाते हैं, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। कांकेर शिक्षा विभाग की यह कार्यशैली संदेह को जन्म दे रही है।
कांकेर शिक्षा विभाग इससे पहले भी कई विवादों में घिर चुका है। करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार मामलों में आदेश जारी होने के महीनों बाद भी जांच आगे न बढ़ पाने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में वर्तमान प्रकरण में निलंबन सूची को गोपनीय रखना विभाग की छवि पर और सवाल खड़े कर रहा है। सोशल मीडिया पर निलंबन से बचाने के नाम पर 2-2 लाख रुपये की कथित वसूली की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं, जिससे संदेह और गहराता जा रहा है।
इस संबंध में जब सोशल मीडिया पर संयुक्त संचालक (जेडी) के नाम से कथित अवैध वसूली के आरोपों को लेकर बात की गई, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि युक्तियुक्तकरण नीति के आदेशों की अवहेलना करने वालों के विरुद्ध सभी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उच्च अधिकारियों के निर्देशानुसार निलंबन की कार्रवाई की गई है। उन्होंने कहा कि निलंबन सूची सार्वजनिक किए जाने में कोई आपत्ति नहीं है और कांकेर शिक्षा विभाग इस प्रक्रिया से क्यों बच रहा है, यह वही स्पष्ट कर सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके नाम से किसी प्रकार की अवैध वसूली से संबंधित कोई शिकायत या साक्ष्य सामने आते हैं, तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल युक्तियुक्तकरण नीति के तहत हो रही इस कार्रवाई ने कांकेर शिक्षा विभाग को एक बार फिर सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या विभाग निलंबन सूची सार्वजनिक कर पारदर्शिता स्थापित करेगा या यह मामला और अधिक विवादों को जन्म देगा।
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