भानुप्रतापपुर:- आदिम जाति कल्याण विभाग के अधीन संचालित आश्रमों और छात्रावासों में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है। बताया जा रहा है कि इन कर्मचारियों को पिछले 9 माह से वेतन नहीं मिला, जिसके कारण उनके परिवार भुखमरी की स्थिति में पहुंच गए हैं।
छत्तीसगढ़ लघु वेतन कर्मचारी संघ के विभागीय सचिव राजकुमार नेताम ने जानकारी देते हुए कहा कि “वेतन न मिलने के कारण कर्मचारी अब पूरी तरह टूट चुके हैं। दुकानदारों ने उधार में राशन देना बंद कर दिया है, घरों में चूल्हा तक नहीं जल पा रहा। बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी असंभव हो गया है।”
एक महीना वेतन न मिले तो लोग परेशान हो जाते हैं, लेकिन यहां नौ महीने से एक भी रुपया नहीं मिला।”- राजकुमार नेताम, विभागीय सचिव
अधिकारियों की लापरवाही पर सवाल
कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने कई बार विभागीय अधिकारियों से वेतन भुगतान की गुहार लगाई, लेकिन हर बार उन्हें “बजट नहीं है” कहकर टाल दिया गया। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, सहायक आयुक्त आदिवासी विभाग से लेकर ब्लॉक स्तर तक, किसी ने भी इस गंभीर समस्या को प्राथमिकता से नहीं लिया। यह स्थिति विभाग की अमानवीय और संवेदनहीन कार्यशैली को उजागर करती है। जहां एक ओर सरकार जनकल्याण और आदिवासी विकास की बात करती है, वहीं उन्हीं विभागों में कार्यरत कर्मचारियों को वेतन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। कई कर्मचारियों ने बताया कि वे अब कर्ज लेकर घर चला रहे हैं। कुछ ने कहा कि बच्चों की फीस और दवाइयों के लिए उन्हें सामान तक बेचना पड़ा है।
“वेतन न मिलने से न केवल आर्थिक, बल्कि मानसिक रूप से भी हम टूट चुके हैं। हमें ऐसा लग रहा है कि विभाग ने हमें पूरी तरह भुला दिया है,” एक कर्मचारी ने बताया।
संघ ने दी चेतावनी-“अब आर-पार की लड़ाई”
छत्तीसगढ़ लघु वेतन कर्मचारी संघ ने इस पूरे मामले में विभाग को तीन दिन के भीतर कार्रवाई करने की चेतावनी दी है।
राजकुमार नेताम ने कहा —
“अगर वेतन तुरंत जारी नहीं किया गया, तो जिलेभर के कर्मचारी एकजुट होकर आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। विभागीय दफ्तरों का घेराव किया जाएगा और आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।”
आवश्यक कदमों की मांग
9 माह से लंबित वेतन का तत्काल भुगतान किया जाए। लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर विभागीय जांच और कार्रवाई की जाए। भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए नियमित भुगतान का स्थायी तंत्र तैयार किया जाए। भानुप्रतापपुर ब्लॉक के आश्रम-छात्रावासों में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की यह स्थिति न केवल एक प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है, बल्कि मानवीय संवेदना पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। सरकार को अब यह समझना होगा कि बिना वेतन के काम करने वाले ये कर्मचारी ही वास्तव में विभाग की रीढ़ हैं -और इन्हें अनदेखा करना, शिक्षा और कल्याण प्रणाली दोनों के लिए हानिकारक है।
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