कांकेर:- कहते हैं-कोई भी इंसान पैदाइशी अपराधी नहीं होता, हालात और व्यवस्था की बेरुखी ही उसे अपराध के रास्ते पर ले जाती है। ऐसा ही एक वाकया सामने आया है उत्तर बस्तर कांकेर जिले से, जहाँ “जल-जंगल-जमीन” का रक्षक कहे जाने वाला एक अनपढ़ आदिवासी युवक वन विभाग के अत्याचारों से टूटा और उसी टूटन ने उसे लाखों का ईनामी माओवादी बना दिया। लेकिन अब वही युवक, जग्गू गोटा उर्फ सुखदेव, जिसने कभी बंदूक के दम पर पूरे इलाके में खौफ फैला रखा था, “पूना नारगेम –पुनर्वास से पुनर्जीवन” अभियान के तहत मुख्यधारा में लौट आया है।
जब न्याय की जगह मिला अन्याय-और उठी बंदूक
जग्गू गोटा, जो कभी कुएमारी एरिया कमेटी का डीवीसीएम (डिविजनल कमांडर) और एलओएस सचिव रहा, उस पर 8 लाख रुपये का इनाम घोषित था।
एक यूट्यूब इंटरव्यू में जग्गू ने अपनी ज़िंदगी की असल कहानी सुनाई —
“हमारा कसूर बस इतना था कि हमने जंगल में अपने परिवार के लिए एक छोटा सा घर बना लिया था।
वन विभाग वालों ने उसे ‘कानून के खिलाफ’ कहकर आग के हवाले कर दिया। पिता के साथ मुकदमा दर्ज हुआ, और हम अदालतों के चक्कर काटते रहे…और वहीं से मेरी जिंदगी की दिशा बदल गई।””
यह वही दिन था, जब जंगल में रहने वाला एक आम आदिवासी युवक धीरे-धीरे बगावत की राह पर चल पड़ा। कुछ ही वर्षों में वह डीवीसीएम स्तर का कमांडर बन गया -वही वन विभाग जिसके अधिकारियों ने उसके पिता का घर फूंका था, अब उन्हीं जंगलों में प्रवेश करने से भी डरने लगे ।
आतंकी से ‘आम आदमी’ बनने की राह
जग्गू गोटा ने बताया कि बंदूक की ज़िंदगी भले डर और ताकत का एहसास देती हो, लेकिन उसमें न नींद होती है, न सुकून।
“हम सोचते थे हम न्याय दिला रहे हैं, पर असल में हम खुद को खत्म कर रहे थे… बंदूक ने हमें आज़ाद नहीं किया, बस और गुलाम बना दिया।”
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शुरू की गई “पूना नारगेम” (पुनर्वास से पुनर्जीवन) नीति ने जग्गू जैसे माओवादियों को एक नया मौका दिया-बंदूक छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का। हाल में आयोजित कुएमारी कमेटी के आत्मसमर्पण कार्यक्रम में 21 माओवादियों ने अपने हथियार डालकर “नई ज़िंदगी” की राह चुनी।
जग्गू गोटा के बयानों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उसने खुलासा किया कि “अतिक्रमण” और “वन अधिनियम उल्लंघन” के नाम पर उनके परिवार को प्रताड़ित किया गया, जिससे सरकार के प्रति गुस्सा पनपा।
हालांकि, पुलिस विभाग ने उन आरोप पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सुरक्षा कारणों से पुलिस ने माओवादी आत्मसमर्पणकर्ताओं के मीडिया संपर्क पर रोक लगाई है।
“एक घर जला, और एक ज़िंदगी भटक गई”
यह कहानी सिर्फ जग्गू गोटा की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जो न्याय के नाम पर अक्सर अन्याय कर बैठता है।
जिस युवक को शिक्षा, सुरक्षा और सहारा मिलना चाहिए था, उसे आग और अपमान मिला-और फिर वह जंगल की बंदूक का सिपाही बन गया।
आज जब उसने हथियार छोड़े हैं, तो यह सिर्फ उसका नहीं, बल्कि पूरे समाज का पुनर्जन्म है।
कांकेर का जग्गू गोटा उर्फ सुखदेव हमें यह सिखाता है कि “हर बंदूक के पीछे एक अधूरी कहानी होती है”।
जब व्यवस्था इंसान को समझने की जगह उसे कुचल देती है, तो वह विरोध में खड़ा हो जाता है-कभी आवाज़ उठाता है, और कभी बंदूक।
लेकिन हर क्रांति का अंत संवाद से ही होता है, और पूना नारगेम जैसी पहलें इसी संवाद की शुरुआत हैं।
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