कांकेर:- कांकेर वन मंडल के कोरर परिक्षेत्र में भ्रष्टाचार और विभागीय मिलीभगत का चौंकाने वाला मामला सामने है। प्रमाणित दस्तावेजों से उजागर हुए इस प्रकरण ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायत के बावजूद डेढ़ माह बीत जाने पर भी विभागीय जांच शुरू नहीं हुई, बल्कि उल्टे आरोपित कर्मचारी को बचाने की कोशिशें तेज कर दी गईं।
वन विभाग का “पुराना पैतरा”-मनमानी और मिलीभगत
माओवादी से आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे जग्गू गोटा उर्फ सुखदेव, जो कभी डीवीसीएम कुऐमारी एरिया कमेटी सचिव / एलओएस कमांडर रहा, ने अपने बयान में बताया था कि कैसे वन विभाग के अधिकारियों की प्रताड़ना और झूठे मामलों ने उसे हथियार उठाने पर मजबूर किया। उसकी यह कहानी केवल बीते समय की घटना नहीं रही-बल्कि आज भी कांकेर वन मंडल के कोरर वन परिक्षेत्र से मिलती-जुलती तस्वीर उभर रही है, जहाँ विभागीय भ्रष्टाचार अब खुलेआम जारी है।
सरकारी राशि गबन का मामला-दस्तावेजों से उजागर
सूचना के अधिकार से प्राप्त प्रमाणिक दस्तावेजों के अनुसार, उप वन परिक्षेत्र बैजनपुरी (कक्ष क्रमांक OA/1540 हरनपुरी) में क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण कार्य के लिए मिट्टी और रेत की खरीदी का रिकॉर्ड दर्ज है। इस कार्य के लिए विभाग ने संबंधित फर्म को 76 हजार रूपये का भुगतान किया गया है, जबकि भुगतान फर्जी वाहन नंबर पर किया गया, और संबंधित फर्म संचालक ने यह स्पष्ट किया कि उसने कोई कार्य या भुगतान प्राप्त नहीं किया। इस पूरे गड़बड़ी को लेकर 17 सितंबर 2025 को वन परिक्षेत्र अधिकारी को प्रमाणों सहित लिखित शिकायत दी गई थी। परंतु -आज तक कोई जांच नहीं की गई, न ही शिकायतकर्ता को कोई सूचना दी गई।
“जांच एसडीओ के पास है”
जब वन परिक्षेत्र अधिकारी कोरर (मो. 9406359851) से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कहा-“शिकायत की जानकारी एसडीओ कोरर को दी जा चुकी है, उनके मार्गदर्शन में आगे कार्यवाही की जाएगी।” वहीं, एसडीओ कोरर जसवीर मरावी ने कहा कि-“उक्त शिकायत विभाग के पास मौजूद है, और नियमानुसार जांच कर कार्यवाही की जाएगी।”
जानकारों का कहना है कि यह मामला केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे विभागीय तंत्र के भीतर गहराई से फैले भ्रष्टाचार की मिसाल है। जनता के टैक्स से वेतन लेने वाले अधिकारी जब योजनाओं के धन का दुरुपयोग करते हैं, तो इससे न केवल विभाग की साख गिरती है, बल्कि ईमानदार कर्मचारियों का मनोबल भी टूटता है।
“क्या सुशासन में भी भ्रष्टाचार सुरक्षित है?”
फर्जी भुगतान और विभागीय चुप्पी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वन विभाग के भीतर जवाबदेही का अभाव है। अब बस्तर के दिग्गज नेता और वन मंत्री केदार कश्यप से इस मामले की शिकायत करने की तैयारी की जा रही है। अब देखना यह होगा कि क्या विष्णु के “सुशासन” में इन भ्रष्टाचारियों को वास्तव में “उल्टा लटकाकर सीधा” किया जाएगा, या यह मामला भी बाकी फाइलों की तरह सरकारी अलमारी में धूल फाँकता रहेगा।
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