दस्तावेजी बाधाओं में उलझा पारधी समाज, शिक्षा और रोजगार से दूरी बनी चुनौती
कांकेर:- प्रदेश में आदिवासी समाज की विविधता उसकी पहचान है । छत्तीसगढ़ में लगभग 42 जनजातियाँ निवास करती हैं, जिनमें राज्य की कुल आबादी का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अनुसूचित जनजातियों का है। गोंड, बैगा, कोरवा, कमार, बिरहोर, मुरिया, माड़िया, हल्बा और अबुझमाड़िया जैसी जनजातियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। लेकिन इन्हीं जनजातियों के बीच एक ऐसा समुदाय भी है, जो आजादी के दशकों बाद भी शिक्षा, रोजगार और बुनियादी अधिकारों से जूझ रहा है। बात हो रही है आदिवासी पारधी समाज की-एक ऐसा समुदाय जो मुख्यधारा से जुड़ने के बावजूद अवसरों की दौड़ में आज भी पीछे है।
साल 1984 के आसपास मुख्यधारा से जुड़ने वाले आदिवासी पारधी समुदाय का इतिहास घुमंतू और शिकारी जीवनशैली से जुड़ा रहा है। शिकार पर कानूनी रोक लगने के बाद इस समाज ने जीविकोपार्जन के लिए बांस से चटाई और टोकरी बनाना तथा कृषि मजदूरी को अपनाया। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि उनके सामने सबसे बड़ी बाधा प्रशासन द्वारा मांगे जाने वाले 50 वर्षों के शासकीय दस्तावेज हैं। दस्तावेजों की अनुपलब्धता के कारण अधिकांश बच्चे आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। माध्यमिक शिक्षा पूरी करने वाले युवाओं को भी सरकारी सेवा में अवसर नहीं मिल पा रहा है। समाज का आरोप है कि कई बार शासन-प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकला। परिणामस्वरूप पूरा समुदाय शिक्षा और सरकारी नौकरियों से वंचित महसूस कर रहा है ।
स्थानीय स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों का कहना है कि उनके विद्यालय में पारधी समुदाय के लगभग 25 बच्चे अध्ययनरत हैं। लेकिन जाति प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेजी जटिलताओं के कारण आगे की पढ़ाई लगभग असंभव हो जाती है। शिक्षकों के अनुसार, समुदाय से अब तक किसी व्यक्ति का सरकारी सेवा में चयन नहीं हो पाया है, जिससे बच्चों के बीच निराशा का भाव बढ़ता है ।
इस मुद्दे पर जिला प्रशासन का कहना है कि जिले के विभिन्न क्षेत्रों में पारधी समुदाय निवासरत है और उनकी दस्तावेजी समस्याओं की जानकारी प्रशासन को है। अन्य जिलों के प्रशासन से भी समन्वय किया गया है। अधिकारियों का मानना है कि शिक्षा और सामाजिक सूचकांकों के लिहाज से यह समुदाय अब भी अत्यंत पिछड़ा है। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि जिले में संचालित योजनाओं, विशेषकर मावा मोदोल जैसी पहल के माध्यम से समुदाय को मंच प्रदान कर शासकीय सेवाओं और अन्य लाभों से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा ।
सर्व आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि पारधी जनजाति की जनसंख्या सीमित है और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के कारण समुदाय गंभीर संकट का सामना कर रहा है। उन्होंने सरकार से इस जनजाति के संरक्षण, शिक्षा और आजीविका के लिए विशेष नीति और ठोस कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते पहल नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियों के अवसर और भी सीमित हो सकते हैं।
आजादी के दशकों बाद भी यदि कोई समाज बुनियादी शिक्षा और रोजगार के अधिकार से जूझ रहा है, तो यह केवल सामाजिक नहीं बल्कि प्रशासनिक चुनौती भी है। आदिवासी पारधी समुदाय की यह स्थिति व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती है। अब देखना होगा कि प्रशासनिक प्रयास इस समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने में कितने कारगर साबित होते हैं।
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