
कांकेर बस्तर के अन्दरुनी इलाकों में आज भी ऐसी कई स्कूलें हैं जहाँ भवन है तो शिक्षक नहीं, शिक्षक हैं तो भवन नहीं, और जहाँ दोनों हैं वहाँ सुविधाएँ नदारद हैं। इन परिस्थितियों में भी कुछ शिक्षक ऐसे हैं जो अपने फर्ज़ को निभाने के लिए हर खतरा मोल ले रहे हैं।
इसी जज़्बे की मिसाल है कोयलीबेड़ा ब्लॉक के खंड शिक्षा अधिकारी और उनकी टीम, जिन्होंने बारिश के मौसम में उफनती कोटरी नदी को पार कर लकड़ी के छोटे नाव से टेबल-कुर्सियाँ बच्चों तक पहुँचाईं।
जान जोखिम में डालकर पहुँची पढ़ाई की कुर्सियाँ
जानकारी के अनुसार, पूर्व माध्यमिक शाला कंदाड़ी के लिए आवश्यक फर्नीचर नदी पार के गाँव में पहुँचाना था। पुल न होने के कारण बारिश के दिनों में यह इलाका कई हफ्तों तक संपर्कहीन रहता है।
ऐसे में खंड शिक्षा अधिकारी और शिक्षकों-कृष्णपाल राणा, राजेश खरे, संजीत कुमार साना और जयपद देहारी — ने बिना संसाधन के, लकड़ी की नाव पर टेबल-कुर्सियाँ लादकर नदी पार कीं।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यह दृश्य सिर्फ समर्पण का नहीं, बल्कि “जिम्मेदारी की मिसाल” था — जहाँ सरकारी कर्मी अकसर सुविधा खोजते हैं, वहीं ये शिक्षक जोखिम में सेवा ढूँढ रहे थे।
“बेहतर शिक्षा सबका अधिकार है”-शिक्षा अधिकारी
जब टीम से इस साहसिक कदम के बारे में पूछा गया, तो खंड शिक्षा अधिकारी ने कहा-
“हम अच्छी तनख्वाह पाते हैं और अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा सकते हैं, लेकिन इन आदिवासी बच्चों का भविष्य हमारे हाथों में है। कम संसाधनों में भी शिक्षा की लौ जलती रहे, यही हमारी कोशिश है।”
बस्तर के बच्चों की उम्मीद
यह तस्वीर केवल एक स्कूल की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों बच्चों की उम्मीद का प्रतीक है जो आज भी पुल, सड़क और सुविधा के बिना पढ़ाई कर रहे हैं।
जिले में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ बच्चों ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद बोर्ड परीक्षा में टॉप-10 में स्थान पाकर जिले और प्रदेश का नाम रोशन किया है।
Page16_News की टिप्पणी
“बस्तर के बीहड़ों में जब शिक्षक कर्तव्य को जुनून बना लें, तब ही शिक्षा असली मायने में उजाला बनती है।”
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